जितनी बड़ी चुनौती उतनी बड़ी कामयाबी आपका इंतज़ार कर रही होती है.

I'm a Satwinder Singh

नमस्कार !

BLOGS पे आपका स्वागत है!



आज बात करते है, जिन्दगी में जितनी बड़ी चुनौती मिलती है उतनी बड़ी कामयाबी आपका इन्तजार कर रही होती है या भगवान आपको जितनी बड़ी कामयाबी देना चाहते है उस कामयाबी को देने से पहले वो आपकी उतनी ही बड़ी चुऔती देकर आपकी परीक्षा ले रहे होते है आइये इसे एक कहानी के जरिये समझने कोशिश करते है. ये कहानी है 1938 कि कैरली नामक हैन्गरियन आर्मी कि वो उस देश का बेस्ट पिस्टल शूटर था कैरली अपने देश के सारे नेशनल चैंपियनशिप को जीत चूका था और अमूमन सबको यही विश्वास था कि 1940 के ओलम्पिक में वही गोल्ड मेडल जीतेगा और उनलोगों का ऐसा विश्वास आधारहीन नहीं था क्योकि कैरली ने सालो से अभ्यास के जरिये अपने हाथ को पिस्टल शूटिंग में दक्ष बना लिया था उसका मात्र और मात्र एक ही ध्येय था उसका एक ही सपना था कि इस हाथ को दुनिया का द बेस्ट हैण्ड बनाना है और उसने बना लिया अब सिर्फ दो साल का फर्क था 1938 में आर्मी का एक ट्रेनिंग कैंप चल रहा था लेकिन दुर्भाग्यवश उसके साथ एक हादसा हो गया जिस हाथ के भरोसे वो गोल्ड मेडल जितने बाला था उसी हाथ में हैण्ड ग्रेनेड फट गया परिणामस्वरूप कैरली ने अपने उस हाथ को गवा बैठा जिसके भरोसे वह अपनी काबिलियत जगजाहिर करने बाला था जो उसका सपना था फोकस था सब खत्म अब उसके पास दो ही रास्ते थे एक ये कि बाक़ी कि पूरी जिन्दगी वो रोता रहे कही जाके छुप जाये और दूसरा ये कि जो उसका गोल था जो उसका डिजायर था उसपे वो फोकस करे तो उसने फोकस उसपे नहीं किया जो चला गया था उसने फोकस उसपे किया जो उसके पास था लेफ्ट हैण्ड The man with only hand एक महीने तक उसका ईलाज हॉस्पिटल में चलता रहा और ठीक एक महीने बाद उसने प्रैक्टिस करना शुरू किया अपने बाये हाथ से और ट्रेनिंग के ठीक एक साल बाद 1939 में वो खुद को वापस लाया वही हंगरी में जहा नेशनल चैंपियनशिप हो रहा था वहा बहुत सारे पिस्टल शूटर आये हुए थे और उनलोगों ने कैरली को देख कर ये कहा ये होती है खेल के प्रती निष्ठा तुम यहाँ इतना सबकुछ होने के बाद भी हमारा खेल देखने आये हो हमारा होसला बढ़ाने आये हो केरली ने कहा मै तुम्हारा खेल बेल देखने नही आया हु तुमसे कम्पीट करने आया हु चलो तैयार हो जाओ और कम्पीटीशन हुआ वहां सभी अपने बेस्ट हैण्ड से फाइट कर रहे थे पर कैरली अपने ओनली हैण्ड से कर रहा था लेफ्ट हैण्ड से और कौन जीता The man with only hand कैरली, पर वो वहा रुका नहीं उसका गोल क्लियर था इस हाथ को देश का नहीं दुनिया का द बेस्ट हैण्ड बनाना था और उसने अपना सारा फोकस 1940 में होने बाले ओलंपिक पे लगा दिया लेकिन वर्ल्ड वार के कारण 1940का ओलंपिक नहीं हो सका लेकिन वह यहाँ हार नहीं मना और इसबार अपना सारा फोकस उठा कर रख दिया 1944 के ओलंपिक पे लेकिन समय को कुछ और ही मंजूर था और इसबार के ओलंपिक को भी रद्द कर दिया गया दुसरे वर्ल्ड वार के कारण . कोई इंसान अपनी पहचान बनाने हेतु कितना बचनबद्ध हो सकता है , कैरली ने अपना सारा ध्यान 1948 के ओलंपिक पर सेट करके बता दिया था . अब जरा याद कीजिये 1938 में उसकी उम्र 28 साल कि थी और अब 38 साल और जो यंगर प्लेयर्स आते है उनसे मुकाबला करना टफ होता चला जाता है कैरली ने जो अपने लिए दिशा निर्देशित किया था उससे तो इतना स्पस्ट था उसके डिक्शनरी में इम्पॉसिबल वर्ड था ही नही और उसने 1948 के ओलंपिक में भाग लिया दुनिया भर से पिस्टल शूटिंग के बेस्ट प्लेयर आये हुए थे जो फाइट कर रहे थे अपने द बेस्ट हैण्ड से और कैरली फाइट कर रहा था अपने द ओनली हैण्ड से और कौन जीता द मैन विथ ओनली हैण्ड कैरली और वो तब भी नहीं रुका और उसने अपना सारा फोकस उठा के रख दिया 1952 के ओलंपिक पे और इस बार भी अपने निर्णय को सही साबित किया और इस बार पुनः गोल्ड मैडल जितके पुरे ओलंपिक इतिहास को नए सिरे से परिभाषित किया क्योकि अबतक किसी ने ओलंपिक में लगातार दो बर्षो तक गोल्ड मेडल नही जीता था आप किसी लूजर के पास चले जाओ उसके पास हजारो रीज़न होंगे मै इस वजह से नहीं कर पाया मै इस कारण से नहीं कर सकता पर आप किसी विनर के पास चले जाओ उसके पास एक ही करण होता है और वो कर जाता है वक्त आ गया है इन चीजो को सीखते/सिखाते आपसे बिदा लेने का फिर आपके लिए एक नया BLOG लेके आऊंगा तब तक के लिए नमस्कार आपका दिन शुभ हो!

4 views0 comments